गेहूं की बोरिया उतार के भीमा ओटे के उपर बैठ गया और मैंने उसे पानी ला के दिया. मेरे पति के मरने के बाद भीमा ने ही सारे खेत की जिम्मेदारी संभाली थी और वो हर सीजन में अनाज या दूसरी फसल उगा के मुझे पैसे या तो अनाज घर तक पहुंचा देता था. भीमा की इसी ईमानदारी ने मुझे उसके तरफ आकर्षित किया था. मुझे भी भरी जवानी में शरीर सुख का आसरा गुमाने के बाद एक वफादार और सुरक्षति साथी की तलाश थी जो मुझे अपने लंड का सहारा दे सके. भीमा से मैं अक्सर चुदाई करवाती थी और उसका लंड मेरी 35 साल की ढलती जवानी का सहारा था. उसने आज तक जरा भी जाहिर नहीं होने दिया था की मैं उसका लंड लेती हूँ, दुनिया के सामने वो वही किसान था जो हमारे खेतो में जोतता था और हमारे घर का एक मुलाजिम था. भीमा की बीवी शांति भी हमारे सबंध से वाकिफ थी और उसे भी इसमें कोई एतराज नहीं था, वह शायद इसलिए की मैं भीमा और उसकी फेमिली की पूरी जिम्मेदारी उठाये हुए थी.
